“कैले बजै मुरुली…. बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा” गोपाल बाबू गोस्वामी द्वारा गाया हुआ एक मार्मिक विरह गीत है। यह गीत एक ओर जहां एक विरहिणी की दशा का वर्णन करता है वहीं उत्तराखंड की उस स्थिति के बारे में भी बताता है जहां अधिकांश पुरुष सेना में काम करते हैं और उन्हें अपनी नयी-नवेली पत्नियों को छोड़ कर युद्ध-भूमि में जाना पड़ता है। भावार्थ : एक युवती जिसका पति युद्ध-भूमि में गया हुआ और उसका कई दिनों से कोई समाचार नहीं आया है जब वह पर्वतों की ऊंची चोटियों…
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