हुड़क्या बौल

हुड़क्या बौल कृषि गीतों का सबसे प्रमुख प्रकार है। यह गीत मुख्यतः यह रोपाई के समय गाये जाते हैं। “बौल” का शाब्दिक अर्थ है श्रम,मेहनत। हुड़्के के साथ श्रम करने को हुड़क्या बौल या हुड़की बौल नाम दिया गया है। सामुहिक रूप से खेत में परिश्रम करते हुए लोगों के काम में सरसता स्फूर्ति तथा उमंग का संचार करने का यह अत्यंत सुन्दर माध्यम है। इस कृषि गीत में एक व्यक्ति हाथ में हुड़का लेकर उसे बजाते हुई गीत गाता है। इस व्यक्ति को हुड़किया कहा जाता है। हुड़के की…

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हिवांलि कांठि चांदि की बणि गैनि

यह नरेन्द्र सिंह नेगी जी का बहुत प्रसिद्ध और पुराना गाना है। सूर्योदय से लेकर सांझ ढलने तक सूरज की सभी अवस्थाओं का बखान करने के साथ ही नेगी जी ने इस गाने में ग्रामीण परिवेश में रह रही महिलाओं की दिनचर्या को भी खूबसूरती से चित्रित किया है। भावार्थ : चमकता हुआ घाम (धूप) बर्फीली चोटियों पर पड़ता है तो ऐसा लगता है मानो हिमाच्छादित यह चोटियां चांदी की बन गईं हो। सबसे पहले (सूरज की पहली किरण) भगवान शिव के धाम, कैलाश पर्वत पर पड़ती है, फिर उसका…

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हाय तेरो मिजाता,मिजाता लुकुड़ छन

आपने गोपाल बाबू गोस्वामी के गाये  ओ परुवा बौज्यू चपल के ल्याछा यस या फिर पतई कमर तिरछी नजर गाने सुने ही हैं, जिसमें एक स्त्री के रूप के साथ उसके फैशन के बारे में भी बात की गयी थी। आज जो गाना आप सुनने जा रहे हैं उसमें एक पति अपनी पत्नी के शानो-शौकत और फैशन से त्रस्त है और उसकी मांगो को पूरी करने में अपने आप को असमर्थ पाता है। मजेदार गाना है यह। भावार्थ : अरे तेरी इस शानोशौकत के क्या कहने,अरे मेरी संतरे के दाने…

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मेरी कमला तो रोये ना, ओ…. सुवा घर ऊंल में चम

उत्तराखंड के पुरुषों का रोजी-रोटी के लिये पहाड़ को छोड़ना और सेना में भर्ती होना एक आम बात है। पति के सेना में होने से उसकी पत्नी पर क्या बीतती है इस पर हमने गोपाल बाबू गोस्वामी द्वारा गाये गीतों कैले बाजे मुरुली, घुघुती ना बासा जैसे गीतों के द्वारा चर्चा की थी। आज हम गोपाल बाबू के जिस गीत की चर्चा कर रहे हैं उसमें एक पति युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान कर रहा है, और उसको छोड़ने को आई पत्नी रो रही है। अपनी पत्नी को दिलासा देता…

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म्यर घर छो रंगीलो, घरवाली रंगीली

गोपाल बाबू गोस्वामी ने अनेक विषयों पर आधारित गीत गाये। आज प्रस्तुत है परिवार नियोजन पर गाया हुआ उनका एक गीत, जिसमें उन्होने यह बताने की कोशिश की है एक छोटा-परिवार किस तरह से सुखी व सम्पन्न है। इस तरह की थीम पर आधारित गाने बहुत कम ही देखने को मिलते हैं लेकिन गोपाल दा तो फिर गोपाल दा ही ठहरे। भावार्थ : मेरा घर कितना अच्छा है, मेरी पत्नी कितनी सुखी है, मेरा छोटा सा परिवार है और मेरा मन खुश है निश्चिंत है। हमारे परिवार में सिर्फ दो…

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Gwai : First Step towards Regionalism in Garhwali Literature

According to wikipedia, the regionalism in literature is defined as-  “In literature, regionalism or local colour fiction refers to fiction or poetry that focuses on specific features – including characters, dialects, customs, history, and topography – of a particular region. Since the region may be a recreation or reflection of the author’s own, there is often nostalgia and sentimentality in the writing.” There have been discussions on standardisation of local language in past (Discussion in Dhad, 1990-91, issue-6,7 and 8 and in Chitthi Patri June, 2004) and this discussion still…

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डाल्यूं ना काटा चुचो डाल्यूं ना काटा

उत्तराखण्ड के लोगों के लिये वन बहुत महत्वपूर्ण हैं और इनका संरक्षण यहां की संस्कृति का हिस्सा रहा है। सरकार द्वारा चलाई जा रही वनसंरक्षण और वृक्षारोपण की योजनाएं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पा रही हैं, इसका कारण प्रमुखत: यह है कि आम जनता की भावनाऐं इन योजनाओं से नहीं जुड़ पाती है। सेमिनारों और गोष्ठियों में भाषण देकर इन परियोजनाओं में सफलता मिल जायेगी, ये सोचना बेमानी है। वनसंरक्षण और वृक्षारोपण तभी सफल हो पायेगा जब इसके लाभ और अनियन्त्रित वन कटान के दुष्प्रभावों के प्रति जनता…

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