[देवेन्द्र मेवाड़ी जी द्वारा सुनाये गये श्यूँ बाघ के किस्से श्यूँ बाघ, देबुआ और प्यारा सेतुआ…., ओ पार के टिकराम और ए पार की पारभती, चिलम की चिसकाटी व बकरी चोर, श्यूं बाघ व नेपाली ‘जंग बहादुर’ , अब कहां रहे वैसे श्यूं-बाघ आप पढ़ चुके हैं। आज वह लेकर आयें है फसलों और त्यौहारों की कहानी : प्रबंधक] “दोस्तो, तुम त्योहार की खुशियां मना रहे हो। तुम्हारी इस खुशी में हम भी शामिल हैं। हम भी? चौंक गए ना? हम यानी तुम्हारी हरी-भरी प्यारी-प्यारी फसलें! अच्छा, यह बताओ कि…
Read More‘धाकड़’ दाज्यू आप चिरंजीवी हो…..
[हमारे साथ नये जुड़े श्री उमेश तिवारी ‘विश्वास की दाज्यू कथा का पहला भाग आपने पढ़ा। अब प्रस्तुत है दूसरा भाग। – प्रबंधक ] आपको लग रहा होगा कि हर छोटा भाई कभी न कभी दाज्यू बनता ही होगा। पर ये ‘सास भी कभी बहू थी’ वाला फार्मूला यहां फिट नहीं बैठता। हर एक भइयू, भुली या कुतानू; दाज्यू नहीं बनता। निरे प्रतिभाशाली ही, दाज्यू के रूप में स्थापित होते गये हैं। उनकी एक पृष्ठभूमि होती है। समाजशास्त्री इसे ‘वैल्यू ओरिएंटेशन इन ए सोसियल सिस्टम’ बताते हैं। जैसे पूत के…
Read Moreअथ दाज्यू गाथा : प्रेम में पागल दाज्यू
[आज से हमारे साथ जुड़ रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश तिवारी ‘विश्वास’। आइए उनकी रचना ‘अथ दाज्यू कथा’ का आनन्द लें। आशा है आपको पसंद आयेगी।- प्रबंधक] दाज्यू बोले तो, भाई जी या बड़ा भाई। बचपन में मुंशी प्रेमचन्द्र की कहानी बड़े भाई साहब पढ़ी थी। उनके दाज्यू को बाद में कई हिन्दी फिल्मों में देखता रहा। जैमिनी से ए.व्ही.एम. के बैनरों में, बलराज साहनी से अभिताभ बच्चन के किरदारों में उनकी छवि मिलती रही। अलबत्ता फिल्मी दाज्यू फेल होने के बजाय फर्स्ट क्लास फर्स्ट आते रहे और छोटे…
Read Moreगौळा मां बडुळि, मेरि पैत्वाल्युं पराज
अपने मूल से उखड़ कर तो एक पौधा भी सूख जाता है, मनुष्य भला कैसे अपनी जन्मभूमि से बिछड़ कर सुखी रह सकता है। नरेन्द्र नेगी जी ने इस गाने के माध्यम से अपने पैतृक गांव और परिवार से दूर रह रहे एक प्रवासी पहाड़ी पुरुष की तड़प व्यक्त की है। शहर की तेज दौड़ती ज़िन्दगी के बीच अचानक इस पुरुष को बडुळि (हिचकी) लगती है, पैरों के तलवों में खुजली लगती है और चूल्हें की आग भरभरा कर आवाज करने लगती है। पहाड़ों में यह माना जात है कि…
Read Moreगाय-भैंस का ब्याना और बिगौत का खाना..
गाय-भैंस ब्याती तो घर में खुशी का माहौल बन जाता। हम नई पैदा हुई बाछी या थोरी को छूना चाहते। घर वाले कहते, ‘मारेगी गाय!’ गाय बाछी को चाटती रहती। दुबली-पतली बाछी लरबर-लरबर करती, उठती-गिरती। कोई नजदीक जाने लगता तो गाय गुस्से से ‘स्यां ss क’ करती। एक-दो दिन बाद पास आने देती थी। हम धीरे से बछिया या भैंस की थोरी को छूते। कितनी मुलायम लगती थीं वे!
Read Moreबेचारा गुजारा …
गोरू-भैंसों को गर्दन पर हमारी अंगुलियों से खुजलाना बहुत अच्छा लगता था। कुछ तो पास आकर खड़ी हो जातीं और गर्दन ऊपर कर देतीं, जैसे कह रही होंµ लो हमारी गर्दन तो खुजला दो! अंगुलियां चलाने या हथेली से सहलाने पर वे गर्दन को वैसे ही ऊपर उठाए रखतीं। वे हमारी हर बात को समझती थीं। हमारी आवाज पहचानती थीं। यहां तक कि पैरों की आवाज भी पहचानती थीं।…
Read Moreब्वाँश, बाघ, मूना और “पैजाम उतार पैजाम”….
दात लेकर मैं ऊपर की ओर दौड़ा। तभी मैंने बाघ को चमकती बिजली की तेजी से नीचे को छलांग लगाते देखा। मैं बकरी के पास पहुंच गया। उसने मुझे देखा तो डर के मारे गला फाड़ कर मिमियाते हुए नीचे की ओर दौड़ लगा दी। वह बकरी नहीं ‘मूना’ (बकरा) था। काले-सफेद रंग का मजबूत और भारी डीलडौल वाला मूना। लंबी दाढ़ी। बाघ ने अपने लिए बकरियों की भीड़ में से सबसे मोटा-ताजा मूना चुना था। …..
Read More