भलु लगुदु भनुलि तेरु माठु-माठु हिटणु हेss भलु लगुदु

नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गाये सैकड़ों गीतों में यह युगल गीत अपेक्षाकृत नया माना जा सकता है । यह उनकी सर्वाधिक बिक्री होने वाली वीडियो सीडी "नौछमी नरैण" में रिलीज हुआ था। इस गीत के बोल बाजूबन्द शैली के कवित्त में लिखे गये हैं, इस तरह के बोलों को "जोड़" भी कहा जाता है। इन गानों में अन्तरों की प्रथम पंक्ति का उपयोग केवल तुक (जोड़) मिलाने के लिये होता है। दूसरी पंक्ति सार्थक होती है लेकिन प्रथम पंक्ति का दूसरी पंक्ति से कोई संबन्ध जुड़े यह जरूरी नहीं…

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नैनीताल और हिन्दी फिलमवाले

[ पिछले अंक में आपने नैनीताल के आसपास फैले प्राकृतिक दृश्यों का आनन्द लिया। डोटियाल यानि नैपाली मजदूरों के बारे में भी पढ़ा। आइये आज नैनीताल के कुछ और दृश्यों का आनन्द लेते हैं। ] यों शाम को मालरोड गुलजार हो जाती थी। लोग तल्लीताल-मल्लीताल की सैर पर निकल पड़ते। जगह-जगह आते-जाते परिचित दूर से ही हाथ सिर की सीध में उठा कर ‘नमस्कार’ की मुद्रा में जोड़ कर इशारे से ही दोनों हथेलियां हिला कर बिना बोले पूछ लेते और दाज्यू, सब ठीक ठाक?’ और, आगे बढ़ जाते। तल्लीताल,…

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हमर उ नैनीताल

पानी से डबाडब भरा विशाल ताल और चारों ओर हरे भरे जंगलों से घिरा शहर नैनीताल। बांज, रयांज, देवदारू और सुरई के पेड़ पहाड़ों में गहरा हरा रंग भरते थे। चीना पीक, स्नो व्यू, लड़ियाकांटा, टिफिन टॉप से रुई के फाहों से बादल निकलते तो लगता नैनीताल का प्राकृतिक दृश्य-चित्र जैसे जीवंत हो उठा है। सुबह-शाम चिड़ियों का कलरव सुनाई देता था। कितना हराभरा था हमारा शहर नैनीताल! हमारे इसी शहर के निवासी जिम कार्बेट ने 1932 में अपनी पुस्तक ‘माइ इंडिया’ की भूमिका में लिखा था कि हमारे शहर…

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छाना बिलौरी कै भलो लांगुं, छाना बिलौरी का ज्वाना

कुमाऊंनी भाषा का एक बहुत पुराना लोकगीत है – “छाना बिलौरी झन दिया बौज्यू, लागनि बिलोरिक घाम“। इस गाने में एक युवती अपने पिता से मनुहार करती है कि उसकी शादी छाना बिलौरी नामक गांव/इलाके में न की जाये क्योंकि वहाँ अनेक प्रकार के कष्ट है और सबसे मुश्किल बात यह है कि तेज धूप पड़ने के कारण वहाँ गरमी होती है। उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी ने इस नकारात्मक गाने को झूठलाते हुए छाना-बिलौरी इलाके की प्रशंसा करते हुए एक गाना रचा – “दी दिया बौज्यू छाना…

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परसि बटि लगातार, बारि-बारि कू बुखार, चड़्यू च रे डाग्टार, मोर्दु छौं उतार-उतार

नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गाये गये सैकड़ों गीतों में हर शैली के गीत उपलब्ध हैं। इन गीतों में बहुत विविधताएं देखने को मिलती है, लेकिन सभी गीत मानवीय भावों के उत्कृष्ट चित्रण, सुन्दर बोलों और मधुर संगीत से सजे हैं। प्रस्तुत गीत नेगी जी ने “छिबराट” नामक आडियो कैसेट में गाया था। यह मजेदरा गीत भी अपने आप में अनोखा है – एक बुजुर्ग महाशय अपने खराब स्वास्थ्य को ठीक करने की पूरी जिम्मेदारी एक डाक्टर को सौंपने की इच्छा रखते हैं। लेकिन वो खान-पान आदि का परहेज रखने…

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विभिन्न देशों के विभिन्न कलैंडर

[ पिछ्ले अंको में आपने कलैंडर के विज्ञान और भारतीय पंचांगों के इतिहास के बारे में पढ़ा। आज पढ़िये विभिन्न देशों में प्रचलित विभिन्न कलैंडरों के बारे में। श्री देवेन्द्र मेवाड़ी जी नें यह आलेख खास अपना उत्तराखंड के पाठकों के लिये भेजा है।] हम चीनी, इस्लामी और यहूदी कलैंडरों की बात कर रहे थे। चीन में नागरिक उद्देश्य के लिए ग्रेगोरीय, लेकिन उत्सव तथा त्योहारों की तिथियों की गणना के लिए विशेष परंपरागत चीनी कलैंडर का उपयोग किया जाता है। विश्व भर में चीनी मूल के लोग इसको काम…

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भारतीय पंचाग की कहानी

[ पिछ्ले अंक में हमने जाना कि कलैंडर का इतिहास कितना पुराना है। आइये जानिये कि भारतीय पंचाग का इतिहास क्या है? श्री देवेन्द्र मेवाड़ी जी नें यह आलेख खास अपना उत्तराखंड के पाठकों के लिये भेजा है। – प्रबंधक ] आइए भारतीय पंचांग यानी भारतीय कलैंडर के बारे में जानते हैं। हमारे देश में लगभग 5,000 वर्ष पहले वैदिक काल में समय की गणना का काम शुरू हो गया था। उन दिनों इस बात का ज्ञान हो चुका था कि चांद्र-वर्ष में 360 से कुछ कम दिन होते हैं…

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