[नया साल शुरु होते ही हम अपने कलैंडर बदल लेते हैं। लेकिन क्या आपको मालूम है कि कलैंडर की शुरुआत कैसे हुई? क्यों 1 जनवरी से ही वर्ष का आरम्भ माना जाता है? क्या किसी वर्ष में 365 की जगह 445 दिन भी थे? क्या किसी महीने में मात्र 21 दिन भी थे? विश्व में कितने तरह के कलैंडर प्रचलित हैं? भारतीय पंचांग की शुरुआत कैसे हुई? इन्ही प्रश्नों का उत्तर जानने के लिये हम एक श्रंखला प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें आपको इन सभी प्रश्नों का उत्तर मिल जायेगा।…
Read Moreज्यू त यन बौनूं च आज नाच नाचि की
नरेन्द्र सिंह नेगी जी और अनुराधा निराला जी की आवाज में यह प्रसिद्ध युगल गीत प्रस्तुत है। प्रेमी-प्रेमिका के लम्बे बिछोह के बाद मिलने पर उनके हृदय की प्रसन्नता, एक दूसरे के निकट रहने की चाह और समर्पण की भावना को दर्शाता यह गाना नेगी जी के कई अन्य गानों की तरह बहुत पुराना और सदाबहार गाना है। प्रेम में डूबे हुए प्रेमी युगल इस गाने के माध्यम से एक-दूसरे के प्रति गहरे प्यार का इजहार कर रहे हैं और इस प्रेम को अक्षुण्ण रखने का संकल्प भी ले रहे…
Read Moreनयु-नयु ब्यो च मिठि-मिठि छुईं लगौंला
नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने बहुत से रोमांटिक गाने गाये हैं। आज हम एक ऐसा ही रोमांटिक गाना प्रस्तुत कर रहे हैं। नेगी जी का शायद ही कोई प्रशंसक होगा जिसने उनका यह गाना सुना और सराहा नहीं होगा। नेगी जी के प्रारम्भिक दौर के गानों में इस गाने का विशिष्ट स्थान है। एक नवविवाहित युगल पहाड़ के पैदल रास्ते से अपने घर जा रहे हैं, लेकिन चलते-चलते वह एक बहस में उलझ गये हैं। दरअसल मामला पैदल चलने की रफ़्तार को लेकर है। नयी-नवेली दुल्हन कोमलांगी है, वह चाहती…
Read Moreनया जमाना का छोरों कन उठि बौल – तिबरी डाण्डैल्युं मां रॉक ऐंड रॉल
युवा पीढी के जोशीले स्वभाव और बेपरवाह रवैये से सम्बन्धित नरेन्द्र सिंह नेगी जी का एक गाना पहले भी इस साइट पर उपलब्ध कराया गया है, आज प्रस्तुत है इसी से मिलता जुलता नेगी जी का एक और गाना। इस गाने के माध्यम से नेगी जी ने पुरानी और नयी पीढी के स्वभाव, विचारों और भावनाओं के बीच पैदा हुए अन्तर को बखूबी दिखाया है। इस दौर में पहाड़ की नई पीढी पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करते हुए अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बहुत तेजी से भुलाती जा रही है…
Read Moreप्रीत की कुंगली डोर सी छिन ये..बेटी ब्वारी पहाड़ू की बेटी ब्वारी
अपने परिवार के हित व सुखों के लिये अपने सारे ऐशो-आराम छोड़कर सारा दिन जंगलों और खेतों में मेहनत-मजदूरी करना ग्रामीण पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या रही है। इस विषय पर कई लेख, कविताएं, किताबें और शोध किये जा सकते हैं लेकिन नरेन्द्र सिंह नेगी जी का यह गाना ही पहाड़ी महिलाओं की कष्टप्रद जिन्दगी का एक स्पष्ट चित्र सामने रखने के लिये पर्याप्त है। इस अन्यन्त भावुक गाने को सुनते-सुनते पता नहीं कितने लोगों की आंखों में आंसूं टपके होंगे, इसका अन्दाजा लगाना सम्भव नही है। नरेन्द्र सिंह नेगी जी…
Read Moreकारगिले लड़ै मां छौऊं…तू उदास न ह्वै मां….
उत्तराखण्ड में सैन्य परंपरा का गौरवशाली इतिहास रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जब अंग्रेजों ने गढवाल-कुमांऊं में अपना राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से आक्रमण किया तो वह यहाँ के यौद्धाओं से बहुत प्रभावित हुए और गढवाल-कुमाऊँ के साथ-साथ नेपाल के गोरखाओं को भर्ती में विशेष रियायतें देकर सेना में शामिल किया। उत्तराखण्ड के वीर सैनिकों ने प्रथम व द्वितीय विश्व में अपने शौर्य का बेहतरीन प्रदर्शन किया। अंग्रेजों के समय ही गढवाल राइफल व कुमाऊँ रेजिमेन्ट का गठन किया गया। स्वतन्त्र भारत के सभी युद्धों में गढवाल…
Read Moreबन्दुक्या जसपाल राणा, सिस्त साधिदे – निसाणु साधि दे
नरेन्द्र सिंह नेगी जी उत्तराखंड के आम लोगों की दिनचर्या और उनकी पीड़ाओं के बारे बहुत से गीत गाये हैं। उत्तराखंड में बाघ का आतंक हमेशा से रहा है। साधारणतया बाघ पालतू गाय, बकरी व अन्य जानवरों का शिकार कर लोगों का नुकसान करता है लेकिन बाघ के आदमखोर हो जाने से उसके द्वारा कई मनुष्यों, घास लेने गयी महिलाओं व छोटे बच्चों को भी अपना शिकार बनाया जाता रहा है। जंगल गयी एक युवती सुमा को आदमखोर बाघ द्वारा अपना शिकार बनाये जाने को लेकर एक बहुत ही मार्मिक…
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