धन मेरो पहाड़ा मैं तेरी बलाई ल्यूंल

“धन मेरो पहाड़ा मैं तेरी बलाई ल्यूंल” गोपाल बाबू गोस्वामी द्वारा एक ऐसा गाना है जिसमें उनका अपने देश भारत और अपने पहाड़ के प्रति प्रेम परिलक्षित होता है। वैसे यह गाना उनके द्वारा गाए हुए गानों की तुलना में छोटा है पर इसमें जो विचार हैं वह बहुत बड़े हैं। वह अपने देश व अपने पहाड़ के लिये क्या क्या करने की तमन्ना रखते हैं वही इस गाने में बताया गया है। भावार्थ : मेरे देश भारत मैं तुझ पर बलि जाऊंगा, मेरे पहाड़ मैं तुझ पर बलि जाऊँगा।…

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Uktat:Satirical Poems of Harish Juyal

The Satirical poetry, as its name suggest, is the art of writing poems which echoes the feeling of satire. Satire is often strictly defined as a literary genre or form; although, in practice, it is also found in the graphic and performing arts. In satire, human or individual vices, follies, abuses, or shortcomings are held up to censure by means of ridicule, derision, burlesque, irony, or other methods, ideally with the intent to bring about improvement (Reference: Wikipedia). In Garhwali literature too the Satirical poems exist. There are various poets…

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आज यो मेरी सुणो पुकारा, धात लगुंछो आज हिमाला

आज जब हर तरफ लोग ग्लोबल वार्मिग की बात कर रहे हैं, वन बचाओ की बातें की जा रही हैं, हिमालय बचाओ का नारा लगाया जा रहा है वहीं गोपाल बाबू गोस्वामी ने बहुत पहले ही अपने एक गाने के माध्यम से इस संदेश को देने की कोशिश की है। अपने इस गाने में उन्होने हिमालय, पशु-पक्षी, पेड़ों द्वारा लगायी जा रही आभासी आवाजों के माध्यम से पर्यायवरण असंतुलन का एक चित्र प्रस्तुत किया है। भावार्थ : आज आकाश-धरती तड्प रहे है, हिमालय झुलस गया है, जंगल जल रहे हैं,…

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देवी बाराही मेरी सेवा लीया पर दैणे होया

गोपाल बाबू गोस्वामी द्वारा गाये हुए एक भजन से आपका परिचय हो चुका है। आज प्रस्तुत है उन्ही की आवाज में एक और भजन। यह भजन देवी बाराही के लिये गाया गया है। उत्तराखंड में देवीधुरा नामक स्थान में बाराही देवी का एक प्राचीन मंदेर है। इस मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षावन्धन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को पत्थरों की वर्षा का एक विशाल मेला जुटता है, जिसे बग्वाल भी कहा जाता है। मेले को ऐतिहासिकता कितनी प्राचीन है इस विषय में मत-मतान्तर हैं। लेकिन माना जाता है कि…

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घर घरुं आज है ग्ये चहा चूसा-चूस

गोपाल बाबू गोस्वामी ने तरह तरह के गाने गाये हैं। अपने गानों में उन्होंने कई बार सामाजिक विषयों को भी छुआ है। उनका ऐसा ही एक गाना है “घर घरुं आज है ग्ये चहा चूसा-चूस” जिसमें उन्होनें पहाडों में चाय पीने के अमल (लत) के बारे में व्यंगात्मक  टिप्पणी की है। इस गाने में उन्होंने उस समय हो रहे सामाजिक परिवर्तनों का जिक्र भी किया है जैसे दूध के उत्पादन का कम, नये लोगों का कृषि कार्यों से मुँह मोड़कर नौकरी के पीछे भागना, टीवी का आगमन और लोगों का…

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ओ आज अंगना आयो री तेरो साजना

“ओ आज अंगना आयो री तेरो साजना”  गोपाल बाबू गोस्वामी द्वारा गाया एक विवाह गीत है जिसमें बरात के दुल्हन के दरवाजे पर पहुंचने का चित्रण है। यह गाना दो संस्करणों में मिलता है। पहले संस्करण, जो संभवत: पुराना संस्करण है, में गोपाल बाबू के साथ किसी गायिका की आवाज भी है दूसरे संस्करण को केवल गोपाल बाबू गोस्वामी ने ही गाया है। दोनों गीतों के बोलों में और बोलों के विन्यास में भी थोड़ा अंतर है। दूसरे संस्करण में शहनाई की धुन पार्श्व में बज रही है जो पहले…

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आज मी के बाटुई लागी, घुट-घुटा गवै मा

रोजी-रोटी के लिये मैदानी क्षेत्रों में पुरुषों का पलायन उत्तराखंड में एक आम बात है।ऐसे में घर की स्त्री, चाहे वह माँ हो, पत्नी हो या बहिन उन्हें घर के पुरुषों की याद आना स्वाभविक है। एक पत्नी को जब अपने पति की याद आती है तो उसकी क्या अवस्था होती है वही “आज मी के बाटुई लागी, घुट-घुटा गवै मा”  गाने की विषयवस्तु है। इसी विरह विषय-वस्तु के भाव कैले बजै मुरूली… हो बैणा या घुघुति ना बासा,आमै की डाई मा जैसे गानों में भी मिलते हैं। इस गीत…

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