ब्वाँश, बाघ, मूना और “पैजाम उतार पैजाम”….

[देवेन्द्र मेवाड़ी जी द्वारा उनके गांवों के किस्से हमें सुनते रहे हैं। उनकी तुंगनाथ यात्रा का रोचक वर्णन भी काफी लोगों ने पसंद किया। उनके श्यूँ बाघ के किस्से श्यूँ बाघ, देबुआ और प्यारा सेतुआ…., ओ पार के टिकराम और ए पार की पारभती, चिलम की चिसकाटी व बकरी चोर, श्यूं बाघ व नेपाली ‘जंग बहादुर’ , अब कहां रहे वैसे श्यूं-बाघ भी आप पढ़ चुके हैं। आज वह लेकर आये हैं गांव के गोरु बाछों की कहानी। इसका पहला भाग आप पढ़ चुके हैं, प्रस्तुत है दूसरा भाग : प्रबंधक]

uttarakhand-forestsगोरू-भैंसें अपने समय पर उठ खड़ी होतीं और फिर चरने लगतीं। पाल् गध्यार में ढांड़ बहुत था यानी बड़ी-बड़ी चट्टानें, पत्थर और झाड़ियां। उनके नीचे छोटे-बड़े उड्यारों में जंगली जानवर छिप सकते थे। कुत्तों और बकरियों को पकड़ने वाले बाघ, तेंदुए तो हो ही सकते थे। ददा एक दिन कह भी रहे थे, “आब् धुरा का वन फरांग (खुला) होता जा रहा है। लोगों ने बांज के फांगे काट-काट कर पेड़ों के ठूंठ बना दिए हैं। जलाने की लकड़ी के लिए भी पेड़ कटते जा रहे हैं। शिकार करके जानवर खतम कर दिए हैं। वन में न खाने को कुछ रहा, न छिपने की जगह रही। ब्वांश (जंगली कुत्ते) बाघ के पीछे पड़े हुए तो मैंने ही देखे! अजमत ही हुई।”

“बाघ के पीछे ब्वांश?” किसी ने पूछा।

“ह्वै भांगी s, मैंने खुद देखा,” ददा बोले। और फिर, उन्होंने पूरी बात बताई, “पहले मुझे ब्वांश दिखाई दिए। तरबर खड़े कान और झपटने को तैयार। लेकिन, किस पर? मैंने आसपास देखा तो कुछ नहीं दिखाई दिया। यह सोच कर आगे बढ़ा कि चट्टान पर से देखूं। तभी सामने बाघ ने लफाल (छलांग) मारी और एक ओर को भागा। पीछे-पीछे ब्वांश। बाघ झटपट एक मोटे दोफांगे पेड़ पर चढ़ गया। भूखे दोनों हुए, ब्वांश भी और बाघ भी!”

ब्वांश? ब्वांश हुए जंगली कुत्ते। कुत्तों से बल्कि थोड़ा छोटे ही होते हैं। छह-सात ब्वांश जानवर को घेर लेते हैं। वह डर कर जान बचाने के लिए दौड़ता है। सबसे आगे मुखिया ब्वांश होता है। वह उछल कर भागते हुए जानवर की पीठ पर चढ़ जाता है और दांतों से पेट फाड़ कर भीतर घुस जाता है। कहते हैं वह जानवर का कलेजा खा लेता है। जानवर गिर पड़ता है तो सभी ब्वांश उस पर टूट पड़ते हैं।”

“क्यों बाघ आप पर नहीं झपटा?”

“कहां, उस बेचारे को तो अपने परान (प्राण) बचाने की पड़ी थी। मुझ पर क्या झपटता। फिर मैंने भी थोड़ा नजदीक जाकर देखा। बाघ डर से गुमची (सिकुड़) कर इधर-उधर देख रहा ठैरा। मैंने सोचा, हे भगवान बाघ की ऐसी हालत? समय का कैसा फेर है! क्या करता, मैंने पत्थर फैंक कर जंगली कुत्तों कौ खदेड़ दिया।”

“अब क्या पता, बाघ फिर बचा या नहीं, कौन जाने?”

“द, किसे पता। उसकी किस्मत!” ददा ने कहा।

मैंने बाद में ददा से पूछा, “ददा, ब्वांश क्या होते हैं?”

“ब्वांश? ब्वांश हुए जंगली कुत्ते। कुत्तों से बल्कि थोड़ा छोटे ही होते हैं। छह-सात ब्वांश जानवर को घेर लेते हैं। वह डर कर जान बचाने के लिए दौड़ता है। सबसे आगे मुखिया ब्वांश होता है। वह उछल कर भागते हुए जानवर की पीठ पर चढ़ जाता है और दांतों से पेट फाड़ कर भीतर घुस जाता है। कहते हैं वह जानवर का कलेजा खा लेता है। जानवर गिर पड़ता है तो सभी ब्वांश उस पर टूट पड़ते हैं।”

मैं जानवर की उस दर्दनाक मौत के बारे में सोचने लगा। फिर ददा से पूछा, “क्या वे ऊपर ठींग के धूरे से नीचे भी आ सकते हैं?”

“आ क्यों नहीं सकते? खाने को वहां कुछ नहीं मिलेगा तो फिर पालतू जानवरों को मारेंगे। लेकिन, उनसे पहले कहीं उनके डर से बाघ वगैरह न आ जाएं। वन में उस बाघ के परान कांप ही रहे थे।”

और, एक दिन उनकी बात सही साबित हो गई।

wild-dogs-1हम रोज की तरह उस दिन भी अपने गोरू-भैसों के साथ पाल् गध्यार गए हुए थे। वहीं कहीं जैंतुवा, पनुदा भी अपनी भैंसें चरा रहे थे। मैं हाथ में लोहे का तेज दात लेकर पत्थरों की दीवाल पर बैठा हुआ था। गलनी गांव के जूनियर हाईस्कूल से नीचे सीढ़ीदार खेतों में, सबसे नीचे की घेरबाड़ वाली दीवाल पर। मैंने कमीज के साथ लाल-सफेद धारियों वाला पैजामा पहना हुआ था।

बैठे-बैठे भैंसों को चरते हुए देख ही रहा था कि ठीक ऊपर के मकान के पास से किसी लड़की के चिल्लाने की आवाज आई, “हुई ss…हुई ss बाघ…म्यार बाकार में बाघ पड़ि गौ…क्वछा…बचावा….बचावा…हुई ss….”

मैं मिड़क खड़ा उठा। पास ही बकरी पर बाघ पड़ने की बात से आंग में झुरझुरी होने लगी। सामने देखा। बाघ-बकरी की गर्दन पर झपट रहा था। बकरी बुरी तरह मिमिया रही थी। बाघ बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन था तो बाघ ही।

ऊपर खेतों से फिर आवाज आई, “अरे क्व छा? क्व छा तुम? ग्वालो, म्यर बाकर बचै द्या…तै बागै कें भजावा….हुई ss….हुई ss….”

(अरे, कौन हो ग्वालो! मेरी बकरियों को बचा दो! बाघ को भगाओ! हुईss)

मेरा आंग फड़कने लगा। दात पर हाथ कस गए। दिमाग में कौंधा-हमारे पुरखे शेर-बाघों से भिड़ गए। शेर के मुंह से आदमी छीन लाए…और मैं? आज मेरे पास भी मौका है!

दात लेकर मैं ऊपर की ओर दौड़ा। तभी मैंने बाघ को चमकती बिजली की तेजी से नीचे को छलांग लगाते देखा। मैं बकरी के पास पहुंच गया। उसने मुझे देखा तो डर के मारे गला फाड़ कर मिमियाते हुए नीचे की ओर दौड़ लगा दी। वह बकरी नहीं ‘मूना’ (बकरा) था। काले-सफेद रंग का मजबूत और भारी डीलडौल वाला मूना। लंबी दाढ़ी। बाघ ने अपने लिए बकरियों की भीड़ में से सबसे मोटा-ताजा मूना चुना था। उसकी गर्दन से खून बह रहा था। मैंने उसे पकड़ने की कोशिश की लेकिन मुझे देख कर वह बदहवाश होकर भागने लगा। बाकी बकरियां भी मिमिया कर इधर-उधर भाग रही थीं।

बैठे-बैठे भैंसों को चरते हुए देख ही रहा था कि ठीक ऊपर के मकान के पास से किसी लड़की के चिल्लाने की आवाज आई, “हुई ss…हुई ss बाघ…म्यार बाकार में बाघ पड़ि गौ… क्वछा … बचावा …. बचावा … हुई ss….”

मैं मिड़क खड़ा उठा। पास ही बकरी पर बाघ पड़ने की बात से आंग में झुरझुरी होने लगी। सामने देखा। बाघ-बकरी की गर्दन पर झपट रहा था। बकरी बुरी तरह मिमिया रही थी। बाघ बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन था तो बाघ ही।

लड़की कुछ और नीचे आ गई थी। वह चिल्लाई, “बाकर जां जनारौ, वां बाघ छ! तुमार पैजाम देखि बेर डरि ग। तुमों कें ले बाघै समझ नारो। पैजामा उतारा, पैजाम!” (बकरा जिस ओर जा रहा है, वहां बाघ है। तुम्हारा पैजामा देख कर डर गया है। तुम्हें भी बाघ समझ रहा है। पैजामा उतारो, पैजामा!)

मेरा ध्यान पैजामे की ओर गया। वह ठीक कह रही थी। चटख लाल-सफेद धारियों वाला मेरा पैजामा देख कर, डरा हुआ मूना मुझे भी बाघ समझ रहा होगा। समझ में आते ही मैंने पैजामा उतार कर फेंका। कमीज-अंडरवियर में मूने के पास गया। वह कांप रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी कांच की जैसी आंखें और भी बड़ी हो गई थीं। हाथ-पैर और आंग टटोल कर देखा। सब ठीक था। लेकिन, गर्दन पर ऐसे गहरे निशान थे जैसे कीलें ठोंकी गई हों। मैं लड़की के साथ मूने को उसके घर के आंगन में ले गया। साफ मिट्टी भिगाई। लड़की से फटा कपड़ा मांगा। फिर गीली मिट्टी की पट्टी बना कर मूने की गर्दन में लपेट कर बांध दी। खून बहना बंद हो गया। मैंने लड़की से कहा, “इसे संभालो। बहुत डर गया है। अब ठीक हो जाएगा।” वह मूने को देख कर रो रही थी। मैं वापस अपने गोरू-भैसों के पास चला आया। कहीं बाघ उन पर न झपट पड़े। वे समझ गई थीं कि कुछ गड़बड़ है। रूक-रूक कर अड़ाती थीं…..अमां ss अमां ss… बाघ बड़ी-बड़ी झाड़ियों से घिरे ढांड़ में न जाने कहां गायब हो गया था। मैं नहीं जानता कि उस मूने का क्या हुआ। बाद में जब भी उसका खयाल आया, मैं मान लेता था कि वह जरूर बच गया होगा।

हां, हो सकता है वह बच गया हो, लेकिन पलि-धार में काफल के पेड़ के पास बाकी गोरू-भैसों के साथ चरते समय पैर क्या रपटा कि एक दिन बूढ़े गुजारा बल्द का जीवन संकट में पड़ गया।

[जारी रहेगा…]

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3 Thoughts to “ब्वाँश, बाघ, मूना और “पैजाम उतार पैजाम”….”

  1. hai mewadi ju…. bhut he acha lga.. .

  2. धन्यवाद भागवत जी।

  3. kafi Romanchak our shhashik kahani jisme bakre muna ki jan bagh se bchai ……………………………………………………………bahut achhi lagi ………..thanks.

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